दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने गुरुवार को आदेश जारी किया कि नीट स्नातक परीक्षा के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर कोई प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। जो गिरफ्तारियां और हिरासतें हो चुकी हैं उनकी समीक्षा कर बंद लोगों को शीघ्र रिहा किया जाएगा। आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी, और आदेश कहता है कि मामले को बिना किसी भावी कार्यवाही के समाप्त माना जाएगा।
जिन छात्रों पर अब भी मुकदमे हैं उनके लिए हफ्तों में यह पहली अच्छी खबर है, और इसे उस सरकार का असली पीछे हटना मानना चाहिए जो पिछले पखवाड़े अपनी पुलिस का बचाव करती रही। पर किसी गृह विभाग का आदेश कार्यपालिका को निर्देश है, किसी चीज़ का कानूनी अंत नहीं। प्राथमिकी एक बार दर्ज हो जाने पर इसलिए खत्म नहीं होती कि पुलिस की देखरेख करने वाली सरकार ने राय बदल ली। अभियोजन वापस लेना अदालत की निगरानी वाला कदम है जो सरकारी अभियोजक से होकर गुज़रता है और जिसके लिए न्यायाधीश की सहमति चाहिए।
यह फासला जितना लगता है उससे ज़्यादा मायने रखता है। जो मुकदमा सोया हुआ है वह खत्म हुआ मुकदमा नहीं है। उसे बाद की कोई सरकार जगा सकती है, वह पासपोर्ट और सरकारी नौकरियों की जांच में सामने आता है, और वह वर्षों तक छात्र के सिर पर टंगा रहता है। इस आदेश के दायरे में आने वाले कई लोग उन्नीस से बाईस साल के हैं और ठीक इन्हीं चीज़ों के लिए आवेदन करेंगे। आदेश उन्हें अगली दस्तक से राहत देता है। साफ रिकॉर्ड नहीं देता।
दूसरी दिक्कत उस वाक्य में है जो अपवाद गढ़ता है। यह संरक्षण उन लोगों तक नहीं जाएगा जिनका आपराधिक अतीत रहा है, यह शब्द आदेश ने सर्वोच्च न्यायालय से लिए हैं। कागज़ पर यह सामान्य बात है, क्योंकि कोई पुराने रिकॉर्ड वालों के लिए माफी की उम्मीद नहीं करता। व्यवहार में यह तय करने का अधिकार उसी बल को दे देता है जिसके आचरण पर शिकायत है। अगर किसी छात्र को प्रदर्शन के दौरान उठाया गया और उस पर कोई पुराना मामला है, तो वह पुराना मामला असली है या खुद पुलिस की किसी पिछली कार्रवाई की उपज, यह जांचने को आदेश किसी से नहीं कहता।
यह आदेश उसके दो दिन बाद आया है जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वह दिल्ली और कई राज्यों में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ज्यादती के आरोपों की गहन, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के लिए एक उच्चाधिकार दल बनाने पर विचार कर रहा है। अदालत ने प्रदर्शनों के सिलसिले में पकड़े गए सभी नाबालिगों की तत्काल रिहाई का आदेश दिया और उन प्रदर्शनकारी छात्रों पर दबावपूर्ण कार्रवाई से रोका जिनका कोई आपराधिक अतीत नहीं है, साथ ही पुलिस को प्राथमिकियों की जांच जारी रखने दी। नोटिस केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार तथा महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल के मुख्य सचिवों को गए।
इस पृष्ठभूमि में दिल्ली का आदेश एक साथ दो काम कर रहा है। वह छात्रों को राहत देता है, और वह उस अदालत को सरकार का जवाब भी है जिसने सफाई मांगी है। मामला बंद घोषित कर देना जवाब दाखिल करते वक्त काम की बात होती है, क्योंकि जो राज्य पहले ही पीछे हट चुका हो उसे अपनी ही पुलिस की जांच का निर्देश देना कठिन हो जाता है। आदेश जो साफ तौर पर नहीं करता वह है उस आचरण पर कुछ कहना जिसकी वजह से याचिकाएं आईं। प्रदर्शनकारियों पर से मुकदमे हटाना और यह जांचना कि प्रदर्शनकारियों के साथ हुआ क्या, अलग सवाल हैं, और जवाब सिर्फ एक का आया है।
इसलिए इस हफ्ते दिल्ली के किसी छात्र की व्यावहारिक स्थिति पहले से बेहतर है और भाषा जितना बताती है उससे कम तय। गिरफ्तारी का तात्कालिक खतरा हट गया है। कागज़ नहीं हटे। यह असली समाप्ति बनेगी या नहीं, यह उन कदमों पर टिका है जो अभी उठे नहीं हैं, और वे विभागीय आदेश में नहीं बल्कि अदालतों में उठेंगे।

