भारत ने देश भर में ट्रक माल ढुलाई तेज करने के मकसद से चौड़े और तेज़ एक्सप्रेसवे बनाने पर करीब 130 अरब डॉलर खर्च किए हैं, लेकिन टोल आंकड़े बताते हैं कि कई ट्रक ड्राइवर अब भी इनके साथ साथ चलने वाले पुराने, ज़्यादा भीड़भाड़ वाले हाईवे को ही पसंद कर रहे हैं। करीब 840 मील लंबे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर टोल रिकॉर्ड के अनुसार 2026 की पहली छमाही में करीब 3,86,000 ट्रक यात्राएं दर्ज हुईं, जबकि इसी अवधि में समानांतर पुराने हाईवे पर यह संख्या 14 लाख रही। 130 मील लंबे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर यह अंतर और भी ज्यादा रहा, जहां करीब 8,500 ट्रक यात्राएं दर्ज हुईं, जबकि पास के पारंपरिक मार्ग पर यह संख्या करीब 61,600 रही।
ड्राइवरों का कहना है कि इसकी वजह सड़क से ज़्यादा उसके किनारे मौजूद सुविधाओं में छिपी है। पुराने हाईवे पर सस्ते ढाबे, टायर मरम्मत की दुकानें और आराम करने की जगहें शायद ही कुछ मील से ज़्यादा दूर होती हैं, जो दशकों की ट्रक आवाजाही के साथ विकसित हुई हैं। वहीं रफ्तार को ध्यान में रखकर बनाए गए नए एक्सप्रेसवे पर प्रवेश के सीमित रास्तों के चलते ऐसी सुविधाएं अक्सर बहुत कम मिलती हैं, यह अंतर उन ट्रक ड्राइवरों के अनुभवों से भी झलकता है जिनके वाहन नई सड़कों पर खराब हुए और उन्हें मदद के लिए पुराने हाईवे की तुलना में कहीं ज़्यादा दूर जाना पड़ा।

